Tuesday, June 18, 2013

इतिहास में डुबकी और बिजली का टोका !!!

१८७७ | साहब ऐसा लगता है जैसे इतिहास का कोई पावरफुल सन-वन है, जैसे ईसई सन में वास्कोडिगामा ने भारत खोजा हो, या महाराणा प्रताप ने किसी ओपची-तोपची को रगदा रगदा के मारा हो | पर डिराओ नहीं | कोई सन नहीं है | ये हमरे मोहल्ले का बड़ा इम्पोर्टेंट घर है | यहाँ हम रहते हैं |

पर अगर आप केवल १८७७ लिखने के बाद मोहल्ला-फोहल्ला का नाम लिख के शहर में चिट्ठी भेज दो तो कोई ज़रूरी नहीं कि वो हमारे ही घर पहुंचे | और वो इसलिए कि ये नम्बर हमारे मोहल्ले में कई घरों का है | दरसल जब प्लोटिंग की गयी थी , उस टाइम एक बहुत बड़े हिस्से का नंबर रखा गया १८७७ | उस हिस्से को आधा खरीदा हमारे परम-पूज्य दादाजी ने |

दादा जी
दादाजी को हमने क्या हमारी माता श्री ने नहीं देखा कभी | पापा की शादी से ५ साल पहले वो इस दुनिया को अलविदा कह गए | इसलिए उनके बारे में कुछ भी लिखने से पहले उनसे माफ़ी , यहाँ जो भी लिख रहे हैं सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है | तो दादाजी हमारे, अंग्रेजों के ज़माने में रजिस्ट्रार क़ानून-गो थे ,  हमारे शहर की तहसील में  | हमारा गाँव शहर से करीब ५० किमी दूर था | जब वो दसवीं में थे , तो फेल हो गए |उनके पिता जी ने उन्हें घर से पूरे सम्मान के साथ निकाल दिया | शहर आकर पहले तहसील में काम शुरू किया | हैण्ड-राइटिंग, खासकर उर्दू की , बहुत ज़बरदस्त थी उनकी , सालों से बंद कोठरी से निकले डायरी के पन्ने इसकी गवाही दे चुके हैं | तो लिखाई के कामों के लिए फेमस हो गए | फिर पढ़ाई भी किये तो बनते बनते एक दिन उसी तहसील में रजिस्ट्रार क़ानून-गो बन गए | हमारी दादी के कथ्य के अनुसार उनकी “तनखा" सन सैंतालीस में ५०० रूपया महीना थी |

ताऊ जी और पापा जी लोगो को उस ज़माने में जेब खर्च के लिए १-२ रुपये डेली मिलते थे | दादाजी ने बच्चन साहब की “लहू में पचहत्तर प्रतिशत हाला" वाली बात चरितार्थ की हुई थी सो शाम को अगर उन्हें आवाज़ लगाकर बुलाते सुना जाता तो , पापा और ताऊ जी चुपचाप लाकर उन्हें तखत पर लिटा देते | उस ज़माने में ना बैंकें थीं , और सरकार के नियम थोड़े कड़े भी थे तो पूरी जिंदगी की कमाई दादा जी ने चांदी के सिक्के में तब्दील करके एक “डेग” में ज़मीन में गाड़कर रख दी थी |

रिटायरमेंट के कुछ दिनों पहले उन्होंने ये प्लाट खरीदा था, १८७७ | तब वो आधा खाली था | तब केवल एक १८७७ था |

कुछ दिनों बाद खबर आयी कि वो सिक्कों वाली डेग चोरी हो गयी | घर की बाकी ज़मा पूंजी बुआ की शादी में लगा दी | ताऊ जी की शादी के लिए आधा प्लाट बेच दिया गया | अब तक बाकी आधे हिस्से के आधे हिस्से में एक “रस्तोगी जी “ ने घर ले लिया था , जो बाद में दशरथ के नाम से जाने गए क्यूंकि उन्ही के सुपुत्र का नाम था “राजाराम" | और जो बाकी का बचा आधा हिस्सा था उसमें दो और प्लाट निकाल दिए गए |

अब उस पूरे बड़े १८७७ के ५ हिस्से हो गए थे | तब तक अंग्रेजों को गए ज़माना गुजर  चुका था और उनके द्वारा छोड़ी गयी मशीनरी में जंग लग चुकी थी लिहाजा पाँचों घरों के मकान नंबर १८७७ हो गए थे |

“कुत्ता ढाल" से उतरने के बाद जो गलियों का आखिरी चौराहा आता है , उसको पार करते ही बाएं हाथ पर पहला घर निगम जी वाला १८७७ है | उससे लगा हुआ राजाराम वाला १८७७ , उसके बाद डेड-एंड | डेड-एंड पर एक गेट है | गेट के उस पार सतीश बाबू की कोठी का हाता | ऐसे तंग महल्ले में एक कोठी भी है |

राजाराम के ठीक सामने का घर शुकला हेड-मास्टर का है | ये उस बड़े प्लाट से अलग है , फिर भी इसका नंबर १८७७ ही है | इसका कारण आजतक नहीं मिला | शुकला हेड-मास्टर हमारे महल्ले के सबसे पढ़े-लिखों में आया करते थे |  रहते वो राजाराम के घर के सामने थे, पर अपने को कम्पेयर राजा दशरथ से करते | यहाँ इनके बारे में बताने का कोई फायदा नहीं है | उनके बारे में तसल्ली से बताया जाएगा कभी |

शुकला हेड-मास्टर से ठीक पहले और हमारे घर के सामने वाला घर है , गुड्डू उर्फ शत्रोहन लाल उर्फ “टोका मास्टर" का |

दादाजी की बात यहाँ बताना इसलिए ज़रूरी था क्यूंकि उन्होंने मोहल्ले के लिए दो काम किये थे | एक, सबसे पहला पक्का मकान बनाया था | दूसरा बिजली के खम्बों के लिए बिजली बिभाग में अर्जी दी थी और बिज़ली सुलभ हुई थी , महल्ले को |  और टोका मास्टर गुड्डू इसलिए ज़रूरी हैं उदधृत किये जाना काहे कि उन्हीं बिजली के खम्बों पर “कटिया-टोका" डालकर उन्होंने महल्ले में अपनी साख बनाई |

गुड्डू जिन्हें हम चाचा कहते थे, गुब्बारे-खिलौने बेचने का काम करते थे | पहले उनका  घर कच्चा बना हुआ था | तब वो गुब्बारे वाले के नाम से जाने जाते थे | फिर जब उनका घर भी पक्का बना और उनके घर का छज्जा ठीक बिजली के खम्बे के पास आकर रुका, उसके बाद से उन्हें “टोका मास्टर" की उपाधि से नवाज़ा गया |

गुड्डू कुल ६ भाई हैं | १ को छोड़ सबकी शादी हो चुकी है |  हैप्पीबड्डे-मुंडन-मड़चटना ये सब उबके यहाँ मासिक क्रियाकर्मों की तरह होते हैं | होली-दिवाली वार्षिक | पर एक काम जो सदियों से नहीं हुआ है वो है “बिजली के बिल का भरा जाना" | पर टोका मास्टर के घर में भीड़ है पर अँधेरा नहीं |  रात में जब लाईट बंद हो जाती है तो अगर उनके घर चोर घुसे तो निकलना तो छोड़िये साहब, आने का रास्ता भूल जाये | और इस बीच अगर किसी ज़मीन पर पड़ी वस्तु से टकरा जाए तो दोनों केस में ही सूता जाए , चाहे बर्तन से टकराए या किसी इंसान से |

खैर, “टोका" डालने की सिध्हस्त्ता के अलावा बिना बिल भरे बिजली जलाने में कोई अगर गुड्डू चाचा का सहायक था तो वो थे बिजली विभाग वाले वर्मा जी | उनके बारे में अफवाह ये थी कि उनकी चार बहुत सुन्दर लड़कियां हैं जिनकी शादी में होने वाले खर्चे के लिए उन्हें गुड्डू जैसे लोगों से मिलने वाले ५-१० रूपये , जो कालान्तर में २०० तक पहुंचे, का मुह ताकना पड़ता | चारों “बहुत सुन्दर" लड़कियों के दर्शन तो कभी नहीं हुए पर वर्मा जी के दर्शन कुछ सालों पहले बंद हो गए , जब वो रिटायर हो गए |

ये गुड्डू चाचा और वर्मा जी के खुले दिल का होने की महानता थी कि महल्ले में बिज़ली लाने की अर्जी का श्रेय लूटने वाले हमारे दादा जी के पोते और  दौड़-भाग-जुगाड़ लगाकर खम्बे लगवाने की वाहवाही लूटने वाले हमारे पापाजी के लड़के , अर्थात हम और हमारे छोटे भ्राता श्री जगहंसाई का पात्र बन गए थे | अकेले जो थे बिजली का बिल जमा करने वाले, पूरे महल्ले में |

राजाराम का कहना था कि टोका डालना तो उनके बाएं हाथ का खेल है | भरी बरसात में नंगे पैर डाल दें | करंट का ट तो दूर की बात है , क भी नहीं लग सकता | पर ना कभी गुड्डू चाचा ने उन्हें छत पर जाने दिया ना कभी हमें उसे दिव्य क्षण के दर्शन हुए |

वर्मा जी के रिटायर होते ही जो लौंडा आया ड्यूटी पर, गुड्डू चाचा की पहले दिन ही उनसे अनबन हो गयी | उन दिनों अन्ना-हजारे का आन्दोलन ज़ोरों पर था | टीवी पर लाइव आ रहा था | पर “ससुरे नए लौंडे" ने गुड्डू चाचा के घर का टोका कनेक्शन काट दिया और तार अपने कब्ज़े में कर लिया | चाचा घर से बाहर आ गए | पहले लौंडे का “सिस्टर-मदर डे” मनाया | अब चाचा की गालियों पर बुढ़ापा साफ़ झलकने लगा था | निहायत ही प्रेडिक्टेबल और पुरानेपन की झुर्रियों से लैस | लड़का नया खून था,  नए जोश से भरा हुआ | चाचा की एक ना चली |तार कब्ज़े में करके चल दिया | चाचा ने चाची को आदेश दिया “आइति है अबहीं” | कहके चप्पल चढ़ाई और लड़के के पीछे पीछे चल दिए |

थोड़ी देर में चाचा हाथ में तार मय मुंह में पान भरे वापस आये | चेहरे पर विजयी मुस्कान थी |  घर के ठीक नीचे चौराहे पर शुकला हेड मास्टर और राजाराम खड़े थे | सबसे पहले चाचा ने नाली में लाल मसौदा इन और काला मसौदा आउट किया “पच्च" की आवाज़ के साथ | फिर हेड-मास्टर साहब से आसीस लिया और राजाराम को छेड़ते हुए बोले “टोका डलिहो राजाराम" | “डाल तो हम देबे करी, इमा कोई गणित थोड़े है"  राजाराम बोले | चाचा ने आँख से इशारा किया “भक्क"  और बोले “ससुरा लड़का तार लिहे चला गवा , हम कहेन काहे ५० रुपिया केर तार खरीदी , दुई की चाय पिलावा ससुरेक , ५ केर एक पान , १० धरेन वहिकी जेब मा | १७ रुपियम काम बनिगा” | हेड-मास्टर साहब ने कहा “अउर का गुड्डू, लच्छमी जी ऐसे थोड़े ना जुड़ती हैं “ |

चाचा फलांगते हुए छत पर पहुंचे और कनेक्शन जोड़ दिया | अंदर टीवी फुल वोल्यूम पर चिल्लाया : “अन्ना ने अनशन खतम करने से मना किया” |

नीली छतरी के उस पार बैठे दादाजी की भी आँखों में आंसू आ गए होंगे !!!!!
                                                                                                                                                 --देवांशु

10 comments:

  1. बस चार 'बहुत सुन्दर' वाले मामले में घपलेस कर गए तुम. बाकी एकदम चकाचक। शाश्वत टाइप :)

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    1. देवांशु जानता था कि अभिषेक भैया उधर ही बह जायेगें इसलिए उधर विस्तार नहीं भया !

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  2. जय हो, एक खाली प्लॉट इतनी कहानी लेकर आयेगा, हम भी एक प्लॉट लेकर कहीं डाल देते हैं।

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  3. :-) likhte raho majaa aa raha hai

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  4. गज़ब फॉर्म में हो आजकल :)

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  5. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए आज 20/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिए एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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  6. गज़ब -एक काल खंड का इतिहास और द एंड भी कैसे मोड़ पे आ हुआ ! अन्ना रे अन्ना !

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  7. क्या जलवेदार पोस्ट है। वाह। अबकी लखीमपुर जब जायेंगे तो 1877 जरूर जायेंगे देखने।

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